गोपनीयता की आड़ में पारदर्शिता की धज्जियां!
सच कहने में भयभीत एवं भ्रष्टाचार व घोटालों में दबंग!!
मौका मिलते ही आनन-फानन में खेल लिया नोशनल प्रमोशन व डिमोशन का बड़ी चालाकी से खेल
वाह रे, वाह! प्रभारी एमडी और एचआर की जुगलबंदी!
पीड़ित जेई को झुनझुना देकर असल दोषियों को एफआईआर व बर्खास्तगी से बचाया?
(ब्यूरो चीफ सुनील गुप्ता)
देहरादून। पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का ढोल पीटने वाली वर्तमान सरकार के राज में गोपनीयता के नाम पर पारदर्शिता की जिस तरह धज्जियां उड़ाई जा रही हैं वह अपने आप में ही हैरतअंगेज है। दरअसल यहाँ पारदर्शिता केवल भाषणों तक ही सीमित रह गयी क्योंकि उसके ऊपर सचिव ऊर्जा का गोपनीयता बरकरार रखने का फरमान अधिक भारी पड़ रहा है।
ज्ञात हो कि प्रदेश के मुखिया के सीधे अधीन ऊर्जा विभाग के तीनों निगमों में भ्रष्टाचार, घोटाले व हेरा फेरी के मामले थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं बल्कि यदि यूं कहा जाए कि इनकी संख्या में दिन दूना, रात चौगुनी बृद्धि हो रही है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।
सच कहने में ढोंगी बने ये भयभीत भ्रष्टाचार, घोटालों व हेरा फेरी में दबंग पिटकुल के कुछ जिम्मेदार सीटों पर बैठे अधिकारी अपने मुंह पर अधिकारिक रूप से जानकारी ना देकर जहाँ ताला लगा लेते हैं वहीं वे उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का जिस तरह माखोल बनाकर मनचाहे रूप में पालन करते हैं वह भी अपने आप में गंभीर है।
जब-जब इन शराफत का लबादा ओढ़े भेड़िये रूपी चन्द अधिकारियों को मौका मिलता है ये लेसमात्र भी नहीं चूकते और अपनी जुगलबंदी से खेल खेलने में पीछे नहीं रहते। ऐसा ही जुगलबंदी का एक मामला प्रकाश में आया है। जिसकी तह में जाकर यदि देखा जाए तो स्वतः ही इनकी पोल-पट्टी खुल जाएंगी।
असल दोषियों को बचाने तथा पीड़ित जेई को नोशनल प्रमोशन का झुनझुना देकर जो खेल खेला गया है उसके पीछे एकबार फिर अवैध कमाई की ललक और परस्पर जुगलबन्दी ही है जिसके चलते असल जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर और बर्खास्तगी जैसी कार्यवाही ना करके प्रभारी एमडी एवं एचआर के द्वारा एक सोची-समझी रणनीति के तहत ही खेल खेला गया है। यही नहीं यह सिर्फ और सिर्फ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की आंखों में धूल झोंकने और कड़क आईएएस एमडी के अवकाश पर जाने का फिलहाल अनुचित लाभ है।
हमारे द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाई जा रही मुहिम में इस प्रकरण में अधिकृत अधिकारियों की चुप्पी और मुंह पर ताला लगे होने और मीडिया से दूर ही रहने की हिदायत ही कुछ आड़े अवश्य आई परन्तु हमारी पड़ताल में जो खुलासे हुए हैं उन पर अब सरकार व शासन में बैठे अधिकारियों का क्या रुख होता है यह तो समय ही बताएगा।
सूत्रों के अनुसार 12 अगस्त 2016 को तत्कालीन निदेशक मानव संसाधन आशीष कुमार के द्वारा एक कार्यालय ज्ञाप संख्या 1389/ मा.स.एवं प्र.वि./ पिटकुल/ ईएस-6 के द्वारा अवर अभियंता राहुल कुमार अग्रवाल को 8.33% कोटे के तहत पदोन्नत कर सहायक अभियंता बनाया गया था. साथ ही सहायक अभियंता को मिलने वाली सभी सुविधाएं तथा ग्रेड वेतन से भी नवाज़ा गया था। उक्त पदोन्नति पत्र की चरण संख्या दो व तीन में कहा गया था की उसकी बैचलर ऑफ साइंस इन इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी की डिग्री की वैधता के संबंध में भविष्य में कोई प्रतिकूल तथ्य प्रकाश में आते हैं तो उसकी पदोन्नति निरस्त कर दी जाएगी. यही नहीं उससे यह भी अपेक्षा की गई थी की कार्यभार ग्रहण करने से पहले वह अपनी इंजीनयरिंग की डिग्री के संबंध में शपथ पत्र देगा।

बताया तो यह भी जा रहा है कि इस पदोन्नति में 18 मार्च 2016 को हुई पिटकुल बोर्ड की 53वीं बैठक में लिए गये निर्णय ऐजेन्ढा सं 5321 का भी मनमाने तरीके से सहारा लिया गया था, जो अब तथाकथित दोषी जेई के लिए ब्ह्मास्त्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है और दोनो को खुश करके, साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे की कहावत को चरितार्थ किया जाये।
सूत्रों के अनुसार पीड़ित पंकज कुमार के पास बीटेक की डिग्री थी, किंतु मानव संसाधन अनुभाग के अधिकारियों की विशेष कृपा और सांठगांठ के चलते सारे नियम कानून और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों व भारत सरकार की नीतियों को नजरअंदाज करते हुए राहुल कुमार अग्रवाल की बैचलर ऑफ साइंस इन इंजीनियरिग टेक्नालॉजी के आधार पर सहायक अभियन्ता बना दिया गया और बीटेक पन्तनगर के डिग्री धारी पीड़ित को नजरअंदाज कर दिया गया।
तभी से अब तक अपने हक के लिए लड़ रहे और ठोकरे खा रहे पंकज कुमार ने जब उच्च न्यायालय की शरण ली और एक रिट पिटीशन 3044 /2018 पिटकुल आदि के विरुद्ध योजित की। उक्त याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह ने 22 दिसम्बर 2020 को एक आदेश पारित करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित आदेश सिविल अपील संख्या 17869/ 2017 एवं 17870 / 2017 के प्रकाश में आठ सप्ताह के अन्दर मामले का निस्तारण करने के आदेश किये।
यहाँ अगर सूत्रों की माने तो राहुल अग्रवाल को पदोन्नति जिस डिग्री के आधार पर दी गयी वह पत्राचार के माध्यम से हासिल की गई बिट्स पिलानी, राजस्थान की डिग्री बताई जा रही है। यह भी बताया जा रहा है कि उक्त तरह के पत्राचार पाठ्यक्रमों को यूजीसी, एआईसीटीई और डिस्टेंस एजुकेशन कौंसिल 2009 में ही अवैध घोषित कर चुकी थी। इस प्रकार वर्ष 2011-14 के दौरान हासिल की गई शून्य डिग्री के आधार पर जानते हुए पिटकुल के मानव संसाधन अनुभाग की गैरजिम्मेदाराना कार्यवाही औरधींगामस्ती की हरकत की ही देन है कि 2016 अगस्त से सुपात्र मिलने वाले प्रमोशन और उसके सापेक्ष सुविधाओं, ग्रेड वेतन आदि से बंचित रहा तथा कुपात्र और अयोग्य व दोषी लगभग साढ़े चार साल सहायक अभियन्ता के रूप में मजे करता रहा और अनुचित लाभ उठाता रहा?
उल्लेखनीय यह भी है कि उच्च न्यायलय के आदेश की आड़ में जिस तरह का घिनोना खेल एक माह के लिये पिटकुल के बने प्रभारी एमडी सिंघल व एचआर ने गत 3 व 4 मार्च को खेला है उस पर भी कई सवालिया निशान लग रहे हैं!
वही सबसे यक्ष प्रश्न यह भी उठता है कि ऐसे संगीन आपराधिक मामले को अंजाम देने बाले उन गैर जिम्मेदार अधिकारियों और तथाकथित अवैध डिग्री प्रस्तुत करने बाले कुपात्र एवं सहयोगी दोषियों के विरुद्ध FIR दर्ज न कराकर और निलम्बन, बर्खास्तगी जैसी कार्यवाही न करके एई से वापस जेई के पद पर डिमोशन कर देना और आनन फानन में ही साढ़े चार सालों से विमुख सुपात्र जेई को अब उक्त जजमेंट की हवाला देते हुए नोशनल प्रमोशन का झुनझुना दिया जाना कहाँ तक उचित है?
यहाँ यह भी ज्ञात हो कि गत दिवस 4 मार्च को ही पदावनत कर जेई राहुल अग्रवाल को झाझरा सब स्टेशन से हटाकर पुरुकुल और सहायक अभियंता के रूप में पंकज कुमार को ज्वालापुर से झाझरा तैनाती बताई जा रही थी फिर आज हमारी पड़ताल से मचे हड़कम्प के पश्चात उक्त 3 मार्च, 2021 के आदेश में परिवर्तन व संशोधन करके सहायक अभियंता पंकज कुमार की तैनाती झाझरा से हटाकर ज्वालापुर किया जाना भी किसी ऑब्लिगेशन का पर्याय बताया जा रहा है।
यही नहीं मामला एमडी खैरवाल के वापस आने तक रफ दफा हो जाये इस बात के भी प्रयास जारी हैं।
चर्चा के अनुसार वर्तमान सरकार की गोपनीयता व पारदर्शिता पर अपनायी जा कार्यप्रणाली कहीं भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति पर भारी न पड़ जाए। देखना यहां यह भी गौरतलब होगा कि मत चूको चौहान की कहावत को चरितार्थ करने बाले इन भ्रष्ट अधिकारियों पर कड़ा रुख अपनाती है या नहीं, या फिर यूँ ही …!