— ये यूपीसीएल के ह्यूमन रिसोर्स निदेशक हैं या हाऊस रिसोर्स?
…गोलमाल तो इनकी आदत में ही है शुमार!
क्या ऐसे ही होते हैं ये ईमानदार आईएएस अफसर, इसीलिए मचाते हैं कड़क होने का आतंक?
खुद की शानो शौकत के लिए नियमों को ठेंगा दिखा काम आठ माह पहले ही दबाव में करा लिया!
स्वीकृति अब कहाँ तक जायज?
पीडब्ल्यूडी निर्माण विभाग नतमस्तक, अधिशासी अभियंता लीपापोती कर भुगतान की जल्दबाजी में!
…और आखिर अब बीस-दस का खामियाजा भुगतेगा कौन?
ईई मुख्यालय भी मामले को दबाने में संलिप्त!
विभागीय सिविल कान्ट्रैक्टर की मजबूरी का लाभ या चापलूस सिंह का माया जाल?
सम्पत्ती सरकार की, मालिक बन बैठे ये…?
पुष्कर राज में ये भी नहीं है दुष्कर!
क्या कड़क एमडी दीपक रावत इन अवैध कृत्यों पर लेंगे एक्शन या डालेंगे पर्दा?
(ब्यूरो चीफ, सुनील गुप्ता)
देहरादून। उत्तराखड का ऊर्जा विभाग क्या कभी सुधर पायेगा भी या नहीं, ऐसा तो शायद सोचना ही नहीं चाहिए क्योंकि इन तीनों ऊर्जा निगमों की हालत दिनों दिन बद से बद्तर होती ही जा रही है और घोटाले कम नहीं हो रहे व जनधन की वर्वादी रुक नहीं रही। जो भी यहाँ एमंडी जैसे जिम्मेदार पदों पर आता है वह नये दरोगा के डंडे की फटकार की आवाज कड़क वाली कहावत को चरितार्थ कर चला जाता है।
प्रदेश के आला अफसरों, आईएएस के द्वारा जनधन की वर्वादी और माले मुफ्त दिले बेरहम का चलन विगत कुछ वर्षों से अधिक ही चल रहा है। जबकि ये कार्य राज्य सम्पत्ती विभाग के हैंं जो किसी नियम व प्रक्रिया के आधीन होते हैं।
मजे की बात तो यह है कि जिनकी जिम्मेदारी हैं नियमों और कानूनों का पालन करना और कराना, वे ही यहाँ बेखौफ होकर धज्जियाँ उडा़ रहा हैं।
ऐसा ही एक मामला ऊर्जा विभाग का प्रकाश में आया है जो ऐसे एक तथाकथित रूप से ईमानदार और कड़क छवि के माने जाते हैं, का है जिनके इस दुष्कत्य से लगने लगा है कि यहाँ ऊर्जा विभाग के कुण्ड में जो भी नहायेगा वह भ्रष्टाचार के रंग में ही रंग कर निकलेगा। क्योंकि ऊर्जा विभाग के निगमों में ऐसे ऐसे महारथी हैं जो चाहे अनचाहे अपनी चापलूसी से पारंगता के शीशे में उतार ही लेते हैं। यहाँ भी शायद ऐसा ही कुछ हुआ बस फिर क्या मशहूर कहावत, कि रजिया फँस गयी गुण्डों में…!
उक्त प्रकरण में उजागर हुये तथ्यों के अनुसार जनधन पर या फिर दूसरों के कन्धों पर बंदूक चलाने में माहिर तथाकथित स्टेनलेश स्टील का चाटुकार यूपीसीएल के प्रभारी निदेशक (एचआर) के द्वारा ऐसा खेल खेला गया जिसने यूपीसीएल व पिटकुल के निवर्तमान एमडी जिनका अभी हाल ही में 24 अफसरों की लिस्ट में ट्रांसफर हुआ था, को अंधेरे में तो क्या ही रखा होगा, मर्जी तो इनकी भी रही होगी तभी तो सात आठ माह तक साहब के निवास टिहरी हाऊस बंगले में टायल, फर्श, दीवारों के प्लास्तर से लेकर खिड़की, दरवाजे, माड्यूलर किचन, माडर्न इलैक्ट्रिक फिटिंग, फैन्सी टाॅयलेट बाथ और शानदार कर्टेन तथा एसी, फ्रिज, फर्नीचर फिक्सर आदि का लगभग 22 से 25 लाख रुपये से अधिक कीमत का एमडी साहब की मनपसंद का काम एक यूपीसीएल के ही सिविल कान्ट्रेक्टर गुप्ता जी से अवैध व अनुचित रूप से दबाव में लेकर उक्त प्रभारी निदेशक व चीफ इंजीनियर साहब द्वारा लारे लप्पे देकर करवा लिया गया। यही नही अपर सचिव / एमडी साहब के सचिवालय स्थित आफिस को भी लाखों रुपये लगवाकर चमाचम करा दिया गया। चीफ साहब के साथ साथ एक्सियन हेडक्वाटर भी इस दुष्कृत्य में सम्मिलित बताये जा रहे हैं। मजे की बात तो यह भी है कि जब एक्सियन साहब से इस सम्बंध में जानकारी चाही गयी तो मुख पर ताला लगाकर कुछ भी कहने से कतरा गये, इतना अवश्य बोल बैठे कि वे क्या करें बडे़ बडे़ साहबों के आगे…!

ज्ञात हो जब काम पूरा हो चुका तो कान्ट्रेक्टर ने साहब से भुगतान माँगा तो पहले तो उसे ईमानदार आईएस साहब की हिसाब का पर्चा थमाने की डाँट मिलीऔर फिर ‘इफ एण्ड बट’। बार बार कभी निदेशक/चीफ साहब के चक्कर तो कभी एमडी साहब के आगे पीछे… मरता क्या न करता। खुश बहुत तो था ठेकेदार कि साहब से सैटिंग हो गई पर यहाँ तो सारे अरमानों पर पानी ही फिर गया। अब जल में रहकर मगर से वैर वाली कहावत गले पड़ गयी।
उल्लेखनीय तो यह है कि सरकारी सम्पत्ति और फ्लेट या आफिस में यदि कोई किसी प्रकार का काम होगा और उसकी नियमानुसार मानकों के अनुसार आवश्यकता होगी तो उसे विधिवत एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होता है किन्तु उत्तराखंड के अधिकांश आलाअफसर जनधन की वर्वादी करने में गुरेज नहीं करते और ट्रांसफर के साथ ही साथ अपने सरकारी आवास और आफिस को अपनी शानोशौकत पूरा करने और शेखी बघारने में लुटाते रहते हैं दयानतदारी से काम करने में नहीं। ऐसा लगता है जैसे राज्य समपत्ति विभाग और सरकार इन अफसरों को टूटी हुई मेज कुर्सी और टपकती झोपडी ही उपलब्ध कराती है।
मजे की बात तो यहाँ यह भी है कि पीडब्लू डी विभाग का निर्माण खंड और उसके अधिशासी अभियंता भी इन आईएएस अफसरों को मंत्र मुग्ध करने और खु रखने के चक्कर में तथा बहती गंगा में हाथ धोने की ललक में सारे नियम कानून बलाए ताक रखते हुये सरकारी धन को खुर्द बुर्द करने में लगे हुये हैं। पीडब्लूडी निर्माण खंड के अधिशासी अभियंता राजेश कुमार ने बताया कि उन्हें तो अभी लगभग एक माह पहले ही स्वीकृति और आदेश प्राप्त हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि 9 लाख 74 हजार रुपये की स्वीकृति आई है उसी के अनुसार भुगतान होगा! पूछे गये इस सबाल पर कि जो काम सात आठ माह पहले ही हो चुका हो उसके होने न होने का जस्टीफिकेशन कैसे होगा? क्या यह काम कराने का तरीका उचित है? क्या अपने निजी शौक, शान शेखी जनधन केबल पर कभी सही ठहराई जा सकती है? क्या इनके लिए सारे नियमों और कानूनों का उल्लंघन माफी योग्य हैं? क्या राज्य सरकार की सम्पत्ति पर अनाधिकार शक्तियों का प्रयोग कानून व सेवा सहिता का हरण नहीं? क्या पीडब्लूडी के संलिप्त अधिशासी अभियंता व राज्य सम्पत्ति विभाग पर भी इनके साथ साथ होगी कार्यवाही?
क्या ऐसे चापलूस और अंधेरे में रखने वाले स्वार्थी प्रभारी निदेशक एच आर जो मानव संशाधन की जगह हास रिसोर्स के काम में भी परिपक्व हैं तथा बडे़ बडे़ कारनामों में संलिप्त रहें है, पर भी कोई कार्यवाही होगी?
क्या उपभोक्ताओं के लिए घाटे की मार का बोझ थोपने वाले ऊर्जा विभाग के यूपीसीएल के ऐसे दिखावटी वफादारों पर कोई कदम उठाया जायेगा?
देखना यहाँ गौर तलव होगा कि पुष्कर धामी सरकार में ऐसे भ्रष्ट आला अफसरों पर कोई संदेशात्मक कडी़ कार्यवाही जनधन की वर्वादी और पद के दुरुपयोग पर होती या नहीं?