अपर मुख्य सचिव मैडम ने किया खुद के ही आदेश और शासनादेश का उल्लंघन ?
पिटकुल के वर्तमान अस्थाई कम्पनी सचिव को आऊट आफ टर्न एक लाख से दो लाख (डबल सेलरी) क्यों?
क्या यह जन-धन को लुटवाना नहीं?
ऐसे धाकड़ सचिव ऊर्जा हैं धामी शासन में!
निरस्त करेगी क्या मुख्य सचिव उक्त आदेश?
(पोलखोल-तहलका ब्यूरो चीफ सुनील गुप्ता की एक और पड़ताल)
देहरादून। यूं तो यह दिन उत्तराखंड की प्रथम महिला मुख्य सचिव बनी वरिष्ठ आईएएस राधा रतूड़ी को वधाई देने का एवं दून वैली सहित उत्तराखंड में पहली बहुप्रतीक्षित हो रही बारिश से हर्ष का है परंतु मीडिया और पत्रकार का काम है कि सदा सचेत करना और जनहित, राष्ट्रहित व प्रदेशहित में अपनी सार्थक भूमिका निभाना, जिसे हम वखूबी निभाते चले आ रहे हैं भले ही इससे आला अफसरों और राजनेताओं और भ्रष्टाचारियों व घोटालेबाजों की आंखों में खटक रहे हों, ” सत्यता कहना यदि बगावत है तो बगावत ही सही…!” का अनुसरण करना हम अपना कर्तब्य समझते हैं दूसरों का कर्तब्य, वे जानें…!
इसी क्रम में विश्वासघातियों का ऐसा कारनामा प्रकाश में आया जिससे अनेकों सवालिया निशान कड़क और ईमानदार आईएएस के रूप में जानी जाने वाली मुख्य सचिव पर लगता दिखाई पड़ रहा है। यही नहीं उक्त दुस्साहस और दुष्कृत्य इतनी सफाई से आधीनस्थ सचिव और पिटकुल के कम्पनी सचिव द्वारा खेला गया और मैडम के हाथों ही उन्हीं के द्वारा जारी उक्त शासनादेश का उल्लंघन करा दिया गया और जन-धन की लुटाई खुद की सेलरी एक लाख से विनाश किसी औचित्य और आधार के डबल अर्थात दो लाख रुपये प्रतिमाह पिटकुल चेयरमैन के रूप में मैडम से ही स्वीकृत करा ली गयी वह भी तब जब काफी प्रतीक्षा के पश्चात आए उस अवसर पर जब अगले दिवस ही मैडम को शासन के मुख्य सचिव के रूप पद पर सुशोभित किया जा रहा हो!
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखंड ऊर्जा विभाग के पिटकुल में विगत 10 फरवरी, 2023 को पिटकुल चेयरमैन द्वारा जारी नियुक्ति पत्र के माध्यम से उत्तराखंड जल विद्युत निगम से दिसम्बर 2018 में सेवानिवृत्त हो चुके कम्पनी सचिव अरुण सभरवाल की अस्थाई नियुक्ति छः माह के लिए पिटकुल में कम्पनी सचिव के पद पर की गई थी। उक्त नियुक्तिपत्र में मान्यवर को एक लाख रुपये प्रतिमाह के साथ-साथ उपमहाप्रबंधक (डीजीएम) स्तर की सुविधाएं भी प्रदान की गईं। बताना यहां उचित होगा कि इस नियुक्ति में एक शासनादेश नहीं बल्कि दो-दो शासनादेशों का उल्लंघन किया गया। शासनादेश के अनुसार जिन महाशय की नियुक्ति की गयी है वे अनेकों प्रकार से अयोग्य व अनुचित थे और ना ही ऐसी कोई विशेष आवश्यकता प्रबल दिखाई पड़ रही थी क्योंकि पिटकुल में उस समय एक ऐसा अधिकारी महाप्रबंधक (वित्त) के रूप में एस के तोमर था जिसे अतिरिक्त प्रभार के रूप में परम्परा और प्रथा के अनुसार कम्पनी सचिव के कार्य का भी जिम्मा सौंपा जा सकता था जबकि एस के तोमर की पिटकुल में कम्पनी सचिव के रूप में 2012 तक रह भी चुके थे जो बाद में पिटकुल के ही वित्त विभाग में रहे। इसे आवश्यक प्रभारी व्यवस्था के अन्तर्गत तोमर को प्रभार दिया गया होता तो शायद पब्लिक मनी की भी बचत होती और काम भी होता!
देखिए नियुक्तिपत्र…!

इससे जहां पिटकुल पर पड़ने वाला अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी बचता तथा अनुभवी व्यक्ति भी मिलता? परंतु जब “हर शाख पर….. अंजाम गुलिस्तां … होगा!” का अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। एक ओर शासनादेशों के विरुद्ध नियुक्ति दूसरी ओर कभी और किसी भी परिस्थिति में न दिया जा सकने वाला एक्सटेंशन वह भी अस्थाई को एक साल से आगे बढ़ाया जाना? बात यहीं पर उल्लेखनीय और विस्मयजनक नहीं है इन महाशय ने ऐसा कौन सा कार्य कर दिया सरकारी सेवाओं में ‘आऊट आफ टर्न’ को भी मात दे दे तथा प्रतिमाह दिए जाने भुगतान को डबल करके एक लाख से दो लाख रुपये प्रतिमाह के आदेश पिटकुल चेयरमैन मैडम से 30 जनवरी को एक प्रस्ताव के माध्यम से करा लिए गये।
देखिए डबल सेलरी किए जाने की स्वीकृति….

मजेदार तथ्य यहां यह भी बताया जा रहा है कि नियमानुसार उपमहाप्रबंधक स्तर की सुविधाओं के विपरीत कम्पनी सचिव महोदय निदेशक स्तर की सुविधाएं वाहन आदि का उपभोग भी एमडी महोदय की कृपा से धड्डले से कर रहे जिसका अतिरिक्त बोझ वेचारा पिटकुल ही झेल रहा है? इसके अतिरिक्त अगर सतर्कता विभाग से इन महाशय की अस्थाई नियुक्ति से पूर्व जांच कराई गयी होती तो इनके यूजेवीएनएल के कार्यकाल की पिछली तीन वर्षों की आडिट रिपोर्ट में उजागर हो चुके कारनामें भी सामने आए होते जो अपने आप में ही अत्यंत गम्भीर थे? साथ ही बताते हैं कि सीएस (company secratary) रूल के अनुसार प्राईवेट प्रैक्टिस व मार्केटिंग और जाब दोनों एक साथ करने की इजाजत का मामला बन सकता था?
ज्ञात हो कि उक्त प्रस्ताव का ड्राफ्ट खुद इन्हीं कम्पनी सचिव महोदय द्वारा तैयार किया गया तथा एमडी के हस्ताक्षर के उपरान्त सचिव ऊर्जा के माध्यम से तत्कालीन अपर मुख्य सचिव महोदया अर्थात चेयरमैन, पिटकुल से स्वीकृत करा लिया गया। हालांकि उक्त प्रस्ताव पर सचिव ऊर्जा के हस्ताक्षर अवश्य नहीं हैं परन्तु मैडम के पूर्व के आदेशानुसार कोई भी प्रस्ताव आदि प्रापर चैनल अर्थात सचिव ऊर्जा के माध्यम से ही उनके समक्ष लाया जाना है! तो ऐसे में क्या सचिव ऊर्जा कि स्वीकृत व लापरवाही नहीं मानी जानी चाहिए? क्या सचिव को पूर्व में जारी शासनादेशों का स्मरण नहीं कराया जाना चाहिए और उक्त आदेश/ प्रस्ताव को अपने स्तर पर ही खारिज नहीं किया जाना चाहिए था? क्या एक वरिष्ठ को अंधकार में रखा जाना उचित था? क्या 27 मार्च, 2014 को मुख्य सचिव, सुभाष कुमार द्वारा जारी शासनादेश का यही कड़ाई से पालन है? यही नहीं 8 सितम्बर 2020 को कार्मिक एवं सतर्कता अनुभाग-2 द्वारा मुख्य सचिव के हस्ताक्षर से मैडम द्वारा जारी शासनादेश का भी कड़ाई से आनुपालन ऐसे ही होगा? और क्या शासनादेशों के अनुसार मुख्यमंत्री से अनुमति ली गयी?
देखिए दोनों शासनादेश…!




यदि नहीं तो क्या वर्तमान मुख्य सचिव महोदया अपने उक्त आदेश को निरस्त करते हुए विश्वासघातियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करेंगी या फिर …?
देखने लायक होगा कि क्या धाकड़ धामी इस गम्भीर दुष्कृत्य और दुस्साहस पर कोई धाकड़ ऐक्शन करेंगे या फिर…!