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पोलखोल : 42 दिन के आदेश को 20 दिनों तक लेखपाल का ठेंगा, आगे भी मर्जी उसी की !

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पोलखोल : 42 दिन के आदेश को 20 दिनों तक लेखपाल का ठेंगा, आगे भी मर्जी उसी की !

डीएम साहब, ऐसे आदेशों का, फिर कोई मतलब?

न एसडीएम को चिन्ता, न ही फिक्र तहसीलदार को!

देहरादून। किसी भी जिले के जिलाधिकारी के आदेश की धज्जियाँ उड़ते अगर देखना है तो उसके लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं होगी, यह नजारा राजधानी दून में ही आप जब तब देख सकते हैं। यकीन नहीं होता तो देख लीजिए देहरादून के डीएम डा.आशीष कुमार श्रीवास्तव, आईएएस के आदेश दिनाँक 18 मई के, जो तत्कालीन एडीएम रामजी शरण द्वारा 21 मई को जारी किए गये थे, आज भी तहसील सदर के दोनों लेखपालों (राजस्व उपनिरीक्षक) के ठेंगे पर हैं। जबकि इन आदेशों में स्पष्ट था कि तत्काल अनुपालन हो। परन्तु दोनों ही तहसील सदर की मलाईदार कुर्सी से मोह भंग नहीं कर पा रहे हैं, भले ही प्रमोशन हो?

यदि यही हाल रहा तो 42 दिनों की अवधि के लिए मान्य डीएम का यह आदेश संख्या -91/सात-स भू .आ. 2020 ऐसे ही पटवारियों की मर्जी से रद्दी की टोकरी में चला जायेगा।

ज्ञात हो कि उक्त आदेश डीएम साहब के द्वारा स्थानीय व्यवस्था के अन्तर्गत ऋषिकेश और बिकासनगर तहसील में काफी दिनों से खाली पडे़ कानूनगो (राजस्व निरीक्षक) के पदों पर अत्यंत आवश्यकता के चलते अस्थाई पदोन्नति व अस्थाई नियुक्ति के लिए किए गये थे। परंतु जैसा अक्सर देखने को मिलता है आर्डरों का क्या वह तो होते ही रहते हैं। चाहे पालन हो न हो! सारा खेल कागजों में – से मतलब होता है।

यदि यही हाल रहा और डीएम साहब ने सुध नहीं ली तो ये आदेश तिकड़मबाजी से कब पलटवा भी दिए जायें, और पता भी न चले मुमकिन है! क्योंकि डीएम के इन आदेशों की न एसडीएम को चिन्ता, न ही फिक्र तहसीलदार को !

उल्लेखनीय ये नहीं कि डीएम साहब के आदेश को पटवारियों ने ठेंगा दिखा दिया, उल्लेखनीय तो यह है, साहब आदेश करने से पहले उनका पालन और जबावदेही भी सुनिश्चित कर लें तो ही अनुशासन वरना कुशासन तो है ही?