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पिटकुल : बृह्ममवारी (रुद्रपुर) – श्रीनगर ट्रान्समिशन 220 के वी डीसी लाईन हुई उर्जीकृत!

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पिटकुल : बृह्ममवारी (रुद्रपुर) – श्रीनगर ट्रान्समिशन 220 के वी डीसी लाईन हुई उर्जीकृत!

बिना बिद्युत उत्पादन के पारेषण किसका करेगी ये 170 करोड़ की लाईन : सवाल

पिटकुल ने लाईन तो बनाई, पर काम तो किसी के न आई!

अभी बिना जरूरत के बन कर तैयार हुई इस लाईन से होने वाले नुक्सानों की भरपाई कौन करेगा? ऐसी लाईन किस काम की जो किसी काम की नहीं रही !

कौन होगा इसके रखरखाव और गारंटी पीरियड का जिम्मेदार?

किस पर पडे़गा पीएफसी और वित्तीय संस्थाओं से लिए गये धन पर ब्याज व भार?

(सुनील गुप्ता की पोल खोल खबर)

देहरादून। उत्तराखंड ऊर्जा विभाग की एक कागजी घोडे़ दौडा़नी वाली तथा हवा में ही अपनी पीठ थप थपाते रहने का एक और कारनामा आज प्रकाश में आया है। जिसे देख कर स्वतः ही स्पष्ट है कि इस विभाग के तीनों निगमों में तालमेल बिठाने के लिए तमाम आईएएस व अभियंताओं और एक्सपर्ट का भारी भरकम अमल कितना अच्छा और काविले तारीफ काम कर रहा है और उसके परिणाम कैसे कैसे सामने आ रहे है, ये देखते ही बनता है। इनकी दूरंदेशी और कार्यप्रणाली का एक और अजीबो गरीव कारनामा प्रकाश में आया है।

उल्लेखनीय है कि पिटकुल ने अपनी स्थापना से अब तक की जिस ताबड़तोड़ मेहनत के साथ इस ट्रान्समीशन लाईन को जिसके लिए बनाया है, उसका अभी दूर दूर तक पता ही नहीं, तो ऐसे में सवाल उठता है कि ये 170 करोड़ की लागत से बनी यह पारेषण लाईन,  किसका पारेषण करेगी? और इसकी भी क्या गारंटी है जब इससे कनेक्टिड जल विद्युत निगम की परियोजनाएँ जो वर्तमान में आधी अधूरी हैं, जब तक परवान चढे़गी तब तक ये लाईनें इस लायक रहेगी भी या नहीं अथवा फिर वही एक और नयी कहानी होगी और दोष एक दूसरे पर थोपा जायेगा।

ज्ञात हो जब से उत्तराखण्ड बना है यानि बीस साल बीत जाने के उपरान्त भी इस प्रदेश की कोई भी ऐसी बडी़ जल विद्युत परियोजना अपने द्वारा निर्मित  नहीं है जो समय पर परवान चढ़ सकी हो या चढ़ने वाली हो!  सभी जल विद्युत परियोजनाए़ या तो उत्तर प्रदेश के समय की हैं या फिर निजी कम्पनियों की हैं। वहीं इसके विपरीत बडे़ बडे़ ढोल वर्तमान सरकार सहित सभी सरकारों ने जब तब खूब पीटे और जनता को भी अभी तक सब्जबाग दिखाकर ठगने का ही काम जारी ही रखा है।

मजे की बात तो यह है कि ऊर्जा प्रदेश कहलाने वाले इस प्रदेश ने बीस वर्षों में करोंडों और अरबों रुपये की परियोजनाओं का भँवरजाल तो फैला दिया परन्तु बिना ठोस प्लानिंग और दूरदर्शिता के ही बिना सामंजस्य के शुरू की गयीं इन हवाई परियोजनाओं को करीव से जाकर किसी भी सरकार या उसके नेता या मंत्री अथवा शासन में बैठे आला अफसरों की फौज ने धरातल पर खडे़ होकर और मौके पर जाकर देखने की कोशिश तक नहीं की, केवल शिलान्यास और फीते काटने तक ही सीमित रह गये। यही कारण रहा है इनकी सुध लेने में नाकाम रहा जल विद्युत निगम आज अपनी किसी एक बडी़ महत्वाकांक्षी परियोजना या परियोजनाओं को अभी तक परियोजनावधि बीत जाने के उपरान्त भी पूरा तो बहुत दूर की बात है आधा भी नहीं करा सका है। जितनी भी परियोजनायें और पाॅवर हाउस व जनरेशन यूनिट काम कर रहीं है (जल विद्युत निर्माण करने वाली ईकाइयाँ) वे राज्य निर्माण से पहले उत्तर प्रदेश के समय की ही बतायी जा रही हैं। यही कारण रहा है कि यहाँ अब तक केवल और केवल जनधन की बरवादी ही देखने को मिली है। इसी वरवादी की कडी़ में बिना बिजली के उत्पादन के बिजली के ट्रान्समीशन का कार्य करने वाली यह एक और पारेषण लाईन पिटकूल द्वारा कल ऊर्जीकृत कर दी गयी और कामयावी के फिर झण्डे तो गाड़ दिये गये, पर उसका लाभ क्या?

पिटकुल से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 150 सर्किट कि.मी. लम्बी और 170 करोड़ की लागत से बनी यह अत्यंत उपयोगी और 2004 के बाद की पहली इतनी लम्बी लाईन है जिसके निर्माण का कार्य मात्र 24 माह में ही पूरा किया गया है और गत दिवस लाईन को सफलता पूर्वक उर्जीकृत भी कर दिया गया।

ज्ञात हो कि यह लाईन पौडी़ गढ़वाल और रुद्र प्रयाग व टिहरी गढ़वाल जैसे दुर्गम क्षेत्र से होकर बिजली की निकासी का काम करेगी। इस लाईन से भविष्य में बनने वाली अनेकों जल विद्युत परियोजनाओं से उत्पादित होने बाली बिजली के ट्रान्समीशन का कार्य अर्थात बिजली की निकासी की जा सकेगी। फिलहाल वर्तमान में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उक्त 170 करोड़ की लागत से बनी लाईन अभी किसी भी इससे कनेक्टिड जल विद्युत परियोजना अथवा जिसके लिए बनाई गयी है, के चालू न होने और विद्युत उत्पादन न होने के कारण सफेद हाथी के रूप में खडी़ रहेगी तथा इसका कोई खास लाभ नहीं होगा। बल्कि यूँ कहा जाये कि यह एक और सफेद हाथी जनधन के ब्लाकेज आफ फण्डस के रुप में और एक नये बोझ के साथ तैयार तो हो गयी है , जिसे ऊर्जा विभाग का निकम्मापन कहा जाये या इसके निगमों के परस्पर सामंजस्य न होने और संयुक्त रुप से योजनाबद्ध कार्य न करने के दुष्परिणाम ही माना जाये। ज्ञात हो कि इसके तैयार हो जाने और बिजली उत्पादन अभी न होने से जो खर्चे और अनावश्यक बोझ फिर जनधन पर पडेंगे उसकी भरपाई और खामियाजा का ठीकरा अब किसके सिर फूटेगा? इस ट्रानसमीशन लाईन का झटका आखिर अब किसे लगेगा?

वैसे कल (आज) सुबक्ह TSR की बुलंदी और मीडिया मैनेजमेंट का बखान और गुणगान कारपोरेट समाचार पत्रों व इलैक्ट्रानिक मीडिया में कसीदे जड़ता अवश्य दिखाई देगा!

फिलहाल यहाँ गोरतलव व देखने लायक बात यह होगी कि अब TSR सरकार इसे कामयावी मानती है या अपने तीन साल की विफलता?

यहाँ यह भी बताना उल्लेखनीय होगा कि ऊर्जा विभाग के तीनों निगमों में कोविड-19 की आड़ में राष्ट्रीय आपदा के समय अन्दर ही अन्दर जम कर गुल खिलाये जा रहे है और मौके से मत चूको चौहान वाली कहावत को चरितार्थ भी किया जा रहा है!