रिस्पना नदी एलिवेटेड रोड प्रकरण !
ये कैसी जनसुनवाई है जिसकी मंशा ही पारदर्शी नहीं?
भूमि अधिग्रहण कानून की धारा -5 के तहत लोक जन सुनवाई बनी मजाक!
साहब आये और बैठे फिर कुछ देर बाद उठ कर चले भी गये, पीडित व याची तकते ही रह गये!
कहीं फिर एनजीटी के आदेश की आड़ में खेला तो नहीं जाएगा खेला ?
अवैध कब्जे उधर और तोड डाली थी इधर की निजी सम्पत्ति! उधर थे प्रभावशाली, इसीलिए!
देहरादून। आज रिस्पना नदी पर बनने बाली फोर लेन एलिवेटिड रोड में भूमि अधिग्रहित होने किए जाने सम्बन्धी प्रकरण में भूमि अधिग्रहण की धारा -5 के तहत बलबीर रोड पर रैन बसेरा में पूर्व घोषणा के अनुसार शोशोबाजी में हुई जन सुनवाई मे सामने आई लोंगो की नाराजगी। एलिवेटिड रोड में अर्जित व अधिग्रहण की जाने वाली भूमि के प्रभावितों का आरोप है कि यह लोक जनसुनवाई जिस तरह से की जा रही उससे लगता जनप्रिय जिलाधिकारी के ये सिपहसालार एसडीएम सदर साहब केवल औपचारिकता ही निभा रहे हैं तभी तो साहब 11 बजे शुरू होने वाली सुनवाई लगभग 11:40 बजे साहब के आने पर शुरू हुई और कुछ देर बैठ कर 12:55 पर साहब उठ कर चले गये तथा अधिकांश लोग भटकते ही रह गये तथा अपनी आपत्ती व प्रत्यावेदन प्रस्तुत नहीं कर पाये।
लोंगो का आरोप है कि सुनवाई कर रहे एसडीएम साहब की मंशा स्पष्ट नजर नहीं आ रही है जिससे वहाँ उपस्थित और अपना प्रत्यावेदन देने आए लोगों का कहना है कि जब जिलाधिकारी महोदय की जन सुनवाई में रिसीविंग दी जाती है तो एसडीएम साहब लोंगो को रिसीविंग देने से क्यों कतरा रहे हैं तथा यह कह कर टरका रहे हैं कि आरटीआई में माँग लेना? एसडीएम साहब शायद यह भूल रहे हैं कि रिसीविंग आवेदक का अधिकार है वरना जंगल में मोर नाचा किसने देखा वाली कहावत चरितार्थ नहीं हो जायेगी और फिर सूचना के अधिकार में वही रटा रटाया जबाब मिलेगा कि चाही गयी सूचना उपलब्ध नहीं है वह भी कम से कम 30 दिन बाद!
क्या वास्तव में जनता व प्रभावितों की समस्यायें सुनी जायेंगी? या फिर मात्र औपचारिकता ही पूरी की जा रही है? यदि एसडीएम साहब की मंशा साफ है तो उन्हें अपने स्टाफ से रिसीविंग दिलाने में क्या आपत्ति है !
ज्ञात हो कि उक्त कथन जनसुनवाई में प्रभावित तथा प्रभावित होने की आशंका से आशंकित रिस्पना नदी के आसपास के निजी भूमि के स्वामियों का है उनका कहना है कि वे अपना प्रत्यावेदन दस्तावेजी प्रमाणों सहित एसडीएम साहब को दे रहे हैं ताकि उनेंह उनके अधिकारों से वंचित ना होना पड़े। प्रत्यावेदन देने वालों की यूँ तो भीड बहुत थी पर कोई सुनने का इच्छुक होता तब तो लोंगो की सुनता और आने वाली अपत्तियों को सुनता।
लोक सुनवाई में चन्दर रोड डालनवाला से आये चार पाँच फरियादियों का तो यहाँ तक आरोप था कि जिस तरह गत वर्ष 27 मई 2024 को जिला प्रशासन व नगर निगम की संयुक्त टीम ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेशों का मजाक उडाते हुए रिस्पना नदी के उस पार के अवैध अतिक्रमणों को ना तोड कर नदी के पुश्ते के इधर की मालिकाना हक वाली बीना शर्मा की 1940 में कोर्ट से क्रय की गयी निजी भूमि व भवन 14 चन्दर रोड के अधिकांश भाग को बलपूर्वक ध्वस्त कर दिया गया था जबकि अवैध कब्जे नदी के दूसरी तरफ लगभग बीस से तीस मीटर से अधिक तक हो रखे थे उनको तोडा जाना चाहिए था परंतु वहाँ एमडीडीए कालोनी की तरफ राजनैतिक दबाव व प्रभाव बाले लोंगों के द्वारा नदी की जमीन खुले आम क्ब्जाई गयी थी और उन पर दो दो मंज़िला मकान बनाए जा चुके हैं । परिणाम स्वरूप व्यथिता को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा। मजेदार बात है कि उक्त भूमि के विश्वसनीए दस्तबेजों व भूमि के 1992 एवं 2009 के संयुक्त सीमांकनों को भी हठधर्मिता के चलते नहीं देखा व माना गया। अपना काम बनता और वाहवाही लूटो व पीठ थपथपाओ, भाड़ में जाये जनता , परेशान होगी तो होती रहे अपना क्या? का सिद्धान्त अपनाया गया था।
ज्ञात हो कि आज बलबीर रोड स्थित रैन बसेरा में 14 (41/28) चन्दर रोड से सम्बंधित श्रीमती बीना शर्मा, प्रशांत शर्मा, ऋषीपाल सिंह एवं अतुल खट्टर सहित अन्य लोंगो ने अपने अपने प्रत्यावेदन उप जिलाधिकारी श्री हरिगिरी को दस्तावेजों व प्रमाणों सहित सौंपे उनका कहना था कि रिस्पना नदी के पुश्ते के इस तरफ उनकी निजी भूमि व सम्पत्तियाँ हैं कहीं ऐसा ना हो उन्हें पता भी ना चले और उनकी भूमि पर नियम विरुद्ध अधिग्रहण अथवा ध्वस्तीकरण की कार्यवाही हो जाए तथा कानून एक बार फिर मजाक बन कर रह जाए!
उल्लेखनीय तो यह है कि बिन्दाल व रिस्पना नदी पर अतिक्रमण किन किन राजनेताओं और अधिकारियों के समय में हुआ या वोट की राजनीति व अवैध कमाई के लिए सैकडों लोगो को बसाया गया परिणाम स्वरूप दोनों नदियाँ छोटी छोटी नालों में सिमट कर रह गईं। इन अवैध बस्तियाँ बस गयीं जिन्हें अब उजाडा जायेगा और यह सरकार के लिए ख़ासी मुसीबत खड़ी हो गयी। दबी जुबान से बस्ती के लोगो का कहना है कि उनसे दो-दो लाख रुपये लेकर उनेह फर्जी कागजी पट्टों पर बसाया गया था और उनमे से कुछ नेता आज सत्ता में या तो विधायक हैं या फिर मंत्री हैं तथा कुछ विपक्ष का होने का दुखड़ा रो रहे हैं। क्या इन नेताओं और उस समय के अफसरों पर कोई दंडात्मक कार्यवाही होगी या फिर तू ना कहे मेरी और मैं ना कहूँ न तेरी की कहावत को चरितार्थ किया जाएगा?


देखना यहाँ गौर तलव होगा कि गरीबों और निर्बलों के मसीहा के रूप में दबंगई से सार्थक भूमिका निभा रहे राजधानी दून के लोकप्रिय जिलाधिकारी सबिन बंसल क्या रुख अपनाते हैं? तथा अपनी ही तरह अपने मातहत अधिकारियों के कार्य करने के तौर तरीकों में भी बदलाव लाकर पारदर्शिता का पाठ पढा पते हैं?