यूपीसीएल में निदेशक परिचालन की कुर्सी रहेगी खाली या फिर हो जायेगी फिर गुपचुप ताजपोशी!

अगर इनको एक्सटेंशन तो उनको टेंशन क्यूँ?

पहले ही नियम विरुद्ध किया जा चुका है सेवा विस्तार व प्रमोशन!

साहब का दोहरा रवैया या नियमो की धज्जियाँ उडा गुमराह किये गये?

काशीपुर बिजली बिल वसूली प्रकरण में चार्जशीटेड हुए 18 अफसर क्या हो चुके थे दोष मुक्त या….?

आखिर नवीन नियुक्तियों पर ही ग्रहण बार-बार क्यूँ?

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड के ऊर्जा विभाग के कारनामों और कलाकारों में इतनी अधिक ऊर्जा है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। आज उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने यूपीसीएल की एआरआर में प्रस्तावित दरों में बढोत्तरी की माँग ठुकराते हुए उपभोक्ताओं को पहली बार बिजली दरों में किसी प्रकार की बढोत्तरी न करने का फैसला सुनाते हुए अप्रत्याशित और पहली बार राहत दी है उससे धाखड धामी को वाहवाही अवश्य मिल रही है क्यूँ कि ऐसा पहली बार ही हुआ है कि दरों में कोई वृद्धि नहीं की गयी। कुछ लोग तो इसे 2027 के चुनाव से भी जोडकर देख रहे हैं। यही नहीं जहाँ एक और धुरंधर धामी सरकार ने विगत 17 मार्च को एक्सटेंशन के आधार पर यूपीसीएल, यूजेवीएनएल के मठाधीशों के विकेट एकाएक गिराये थे उनसे लग रहा था कि अब प्रदेश में एक्सटेंशन की आदत पर विराम लग गया परंतु वहीं दूसरी ओर यूपीसीएल के निदेशक (परिचालन) के पुनः एक्सटेंशन दिए जाने की चर्चा से कान्ट्रेक्टरों को अजब खुशी के साथ परस्पर मिठाईयाँ बाँटते देखा गया और वर्तमान डीओ के द्वारा अगले तीन दिन का विभागीय कार्यक्रम का जारी होना तथा टेण्डरों के पार्ट-2 के खोले जाने की तैयारियां भी स्वयं में पार्दर्शिता की नीति को भी ठेंगा दिखाते हुए गुपचुप फरमान और पुनः ताजपोशी की ओर इशारा कर रहे हैं जबकि अभी कोई अधिकारिक आदेश प्रदर्शित नहीं हुआ है।

ज्ञात हो कि विगत कई वर्षों पूर्व भी इस एक्सटेंशन व्यवस्था पर विराम लगा था और अतुल अग्रवाल व बीसीके मिश्रा सहित अनेकों डायरेक्टरों और प्रबंध निदेशकों को सेवानिवृति के साथ ही घर भेज दिया गया था उसके बाद वर्तमान सरकार में यह एक्सटेंशन की परिपाटी किसी विशेष की तैनाती लेकर शुरू हो चुकी है जिसका व्यापक विरोध भी देखने को मिल रहा है। यही बजह है कि तीनों निगमों में भृष्टाचार चरम पर है!
उल्लेखनीय यहाँ यह नहीं कि निगमों में नवीन नियुक्तियाँ करने की प्रक्रिया शुरू नहीं, शुरु तो होती पर कोई न कोई ग्रहण लग जाता है ऐसी स्थिति में बेचारा ऊर्जी विभाग भी करे तो क्या करे। कभी नवीन नियुक्तियों की प्रक्रिया के दौरान नियमावली में एमडी के पदों पर तकनीकि योग्यता को लेकर हुए परिवर्तन का मामला हो या फिर मैटर को सबजुडिश के आधार पर प्रभारी व्यवस्था तेरा ही सहारा अथवा कार्यो के अनुभव को देखते हुए एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन का नायाब तरीका। भले ही इससे निगमों के अभियंताओं में व्याप्त असंतोष और यूनियनों का निरंतर विरोध ही हो। अभियंताओं का तो यह भी कहना है कि अब मुख्य अभियंता व डाईरेक्टर बनने के ख्वाब देखना दयानतदारी से छोड जहाँ हो उसी में संतोष कर लो क्यूँकि जब ऊपर के अधिकारी रिटायर ही नहीं होंगे तो प्रमोशन कैसे होंगे!

बताया जा रहा है कि यहाँ “जा पर कृपा साहब की होई ताके पाप मिटे सब कोई” फिर भले ही निदेशक (परिचालन) के 2025 में हुए एक वर्ष के सेवाऋविस्तार और उसके साथ साथ तथाकथित जारी काशीपुर के चार करोड की बिजली वसूली में जारी हुई 18 अफसरों को चार्जशीट के बाबजूद भी मुख्य अभियंता स्तर-2 से स्तर-1 पर प्रमोशन का मामला हो? मजेदार तथ्य यह भी प्रकाश में आया है कि जिस आर्टीकल 34 का हवाला देकर गत वर्ष सेवा विस्तार देकर नियुक्ति की गयी वह आर्टीकल अभियंता स्तर पर प्रभावी ही नहीं हो सकता फिर ऐसे में तो ऐसा ही स्पष्ट हो रहा है कि साहब का दोहरा रवैया नहीं बल्कि गुमराह करके ही खेल खेला गया – खैर यह तो जाँच व कार्यवाही के विषय हैं और सरकार की मंशा पर निर्भर हैं!

देखना यह गौरतलव होगा कि धुरंधर धामी सरकार एक्सटेंशन पर क्या रुख अपनाती है? क्या निगमों में प्रोन्नत्तियों में हो रही मनमानी तथा नियम विरुद्ध शासन से हो रही नियुक्तियों की पुनरावृति पर भी कोई कारगर कदम उठाया जायेगा ताकि भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की दिशा में सार्थक पहल नजर आये…!

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