देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 25 से 29 अक्टूबर तक पांच दिवसीय लेखक गांव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव-2026 आयोजित किया जाएगा। थानो स्थित लेखक गांव में होने वाले इस आयोजन में 40 देशों के हिंदीभाषी विद्यार्थियों के साथ साहित्यकार, शिक्षाविद, पत्रकार और कलाकार हिस्सा लेंगे। पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने पत्रकार वार्ता में महोत्सव की घोषणा की।
हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने पर होगी चर्चा
महोत्सव की मुख्य थीम ‘भारतीय भाषाएं एवं संयुक्त राष्ट्र में हिंदी’ रखी गई है। आयोजन के दौरान हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की संभावनाओं, विदेशों में हिंदी शिक्षण और भारतीय भाषाओं के वैश्विक विस्तार पर विचार-विमर्श होगा। इसके साथ ही भारतीय साहित्य, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा।
राज्यपाल करेंगे उद्घाटन, समापन में उपराष्ट्रपति के शामिल होने का कार्यक्रम
कार्यक्रम पुस्तिका के अनुसार, 25 अक्टूबर को उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन होंगे। योगगुरु स्वामी रामदेव और मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति पृथ्वीराज सिंह रूपन सहित कई विशिष्ट अतिथियों के शामिल होने का कार्यक्रम है। वहीं, 29 अक्टूबर को होने वाले समापन सत्र में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के शामिल होने का कार्यक्रम निर्धारित है।
साहित्य, एआई और जलवायु परिवर्तन पर होंगे सत्र
महोत्सव में साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा, डिजिटल संस्कृति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में मानवीय संवेदनाओं जैसे विषयों पर चर्चा होगी। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, हिमालय की चुनौतियों, भारतीय ज्ञान परंपरा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और युवा लेखन पर भी विशेषज्ञ अपने विचार रखेंगे।
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को मिलेगा मंच
आयोजन में उत्तराखंड की प्रकृति, पर्यटन, लोककला, लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति से जुड़े कार्यक्रम भी होंगे। 28 अक्टूबर को हिंदी, गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी कवि सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। पुस्तक मेले, चित्रकला प्रदर्शनी, बाल सृजन उत्सव और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए प्रतिभागियों को साहित्य और कला से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
महोत्सव का उद्देश्य भारतीय भाषाओं की विरासत को संरक्षित करना, हिंदी की वैश्विक पहचान को मजबूत करना और विभिन्न देशों की भाषाओं एवं संस्कृतियों के बीच संवाद को बढ़ावा देना है।