वाह रे, वाह ! सूचना विभाग वाह !! एक और विवाद के घेरे में !
कमजोरों के गला घोंटने और अपनो को मक्खन खिलाने की आदत ही पड गयी है क्या ?
बेब न्यूज पोर्टल की टेण्डर प्रक्रिया पर ही खडे कर दिए सवाल !
क्या डीजी सूचना करेंगे निरस्त ये टेण्डर या फिर धाखड और धुरंदर सीएम को ही लेना पडेगा संज्ञान?
(ब्यूरो चीफ सुनील गुप्ता की पडताल)
देहरादून।एक मशहूर शायर दुष्यंत कुमार का शेर की पंक्तियाँ याद आ गई कि-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए!!
परंतु यहाँ बिल्कुल इसका उलट ही देखने को मिल रहा है क्यूँकि इनके सीने ही नहीं दिखाई पडते हैं जिधर भी नजर डालोगे उधर, भृष्टाचार और अपनों अपनों को लाभ पँहुचाने या कमजोरों और वास्तविक हकदारों का गला घोटते ही नज़र आयेंगे।
ऊर्जा विभाग की तर्ज पर तीव्रगति से बढता सूचना विभाग
अभी तक तो ऊर्जा विभाग के निगम ही इस दौड में सबसे आगे चल रहे थे जहाँ अपने निजी लाभ के लिए बिना किसी आधार व नियम के सैटिंग गेटिंग न होने के चक्कर में निरत किये जा रहे हैं और दुहाई विकास की दे देकर पूर्व के टेण्डर किये जा रहे धडल्ले से निरस्त जिनसे फिर नये नये विवादो में फँसता जा रहा है। ऐसे में विकास या विनाश?
ऐसा ही एक मामला उत्तराखंड सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का प्रकाश में आया है हाँलांकि सूचना विभाग भी पहले से ही अनेकों विवादों के कारण चर्चा में रहता है पर मजबूरी यहाँ स्वयं उन कारपोरेट मीडिया या गोदी मीडिया के धाकड संदेशवाहक रूपी तथाकथित स्वार्थी पत्रकारों की है जो चाहते हुये जो मिल रहा है उसी में भलाई मानकर समाचार की सुर्खियाँ नहीं बनाते! वरना ये और बख्श दें? ऐसे में कमजोर और लेखनी के सिपाहियों के साथ अत्याचार होना तो स्वाभाविक है।
इसी अत्याचार और जुल्मों सितम का मामला 17 माह से प्रतीक्षारत ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ श्रेणी के न्यूज पोर्टल और बेब पोर्टलों के सम्बंध में सोशल मीडिया अनुभाग के द्वारा गत दिवस जारी हुये कार्यालय आदेश संख्या 447, 448 एवं 449 में देखने को मिला जिसमें क्रमशः श्रेणी ‘क’ में 1460 न्यूज पोर्टल व वेब साईटों एवं श्रेणी ‘ख’ में 51 तथा श्रेणी ‘ग’ में 71 को विज्ञापनों के लिए सूचीबद्ध किया गया है।


यहाँ मजेदार बात यह नहीं कि 1582 पोर्टलों की भारी भरकम संख्या है और बजट बडे बडे घरानों के मीडिया हाऊसों को ओवलाईज करने में से बचीखुची धनराशि को कैसे इस भीड में संजोया जाये और बांटा जाये इसके लिए शीर्ष जिम्मेदार अधिकारी 17 महीनों से ऊहापोह की स्थिति से गुजर रहे थे या फिर यूँ कहा जाये कि विवेकहीन हो गये थे तभी तो फिर वही पुराना रास्ता “नियम गये भाड में और न खाता न वही, जो हम कर दे वही सही” की कहावत को चरितार्थ करते हुये ए केटेगरी में एल-1 आये रेट 1200/- को ही बी और सी कैटेगरी पर भी थोप दिया गया जबकि बी और सी के कैटेगरी के रेट ए कैटेगरी के बिडर्स से कई गुना अधिक आये थे।
उल्लेखनीय तथ्य यहाँ ये है कि तीनों श्रेणी में जब टेण्डर बिड अलग अलग माँगी गयी थीं तो उन्हें ए कैटेगरी के पैमाने से क्यूँ तोला गया? क्या यही है सूचना विभाग के अधिकारियो का विवेक? क्या ये बी और सी कैटेगरी के न्यूज पोर्टलों और वेबसाईटों के साथ अत्याचार नहीं?
मजेदार बात यहाँ यह भी है कि जब ‘क’श्रेणी में बिड एल-1 1200/- की दर से आई तो, सूचना विभाग के खैरख्वाह इन बगुलाभगत कर्ताधर्ताओं ने “चित्त भी मेरी और पट्ट भी तथा टैय्या मेरे बाप की” कहावत को अंगीकृत करते हुए दूसरी ‘ख’ और ‘ग’ श्रेणी पर नियम विरुद्ध थोप दिया जिसे किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता है क्यूँकि अपेक्षाकृत “ख” और “ग” श्रेणी में एल-1के रेट बहुत अधिक आये तो फिर ये घालमेल क्यूँ? जब टेण्डर अलग-अलग हुए और उनके पैमाने अलग-अलग हैं!
यहाँ एक और मजेदार तथ्य यह भी है कि इस “जबर मारे और रोने भी न दे” की कहावत को साकार करने के लिए उक्त कार्यालय आदेश जारी करने अर्थात टेण्डर नियमों के अनुसार रेट घोषित होने पूर्व ही सभी से तकनीकि पार्ट खुलने के साथ ही सहमति और प्रतिभूति राशि 8 अगस्त तक ले ली गयी ताकि मजबूर पोर्टल स्वामी टस से मस न हो सकें।
यहाँ अगर जानकारों की माने तो सूचना विभाग के इस पूरे प्रकरण में जो तथ्य उभर कर सामने आ रहे हैं उनके अनुसार –
1)- जब निविदा में A, B और C तीन अलग अलग categories बनाई गयी तभी तो बिडर्स ने अलग अलग रेट quote किए वहीं दूसरी ओर जब टेण्डर डाक्यूमेंट में यह लिखा ही नहीं कि A category का L-1 rate ही B और C पर लागू होंगे? ऐसे में भी पूरी टेण्डर प्रक्रिया ही निरस्त होने योग्य है!
2)- इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि A/B/C category बनाने का फिर उद्देश्य ही क्या रह जाता है?
3)- इन तीनों कैटेगरी को जब अलग अलग ट्रेफिक / reach के आधार पर बनाया गया तो?
4)= यही नहीं टेण्डर में कैटेगरी के अनुसार रेट भी अलग अलग ही क्यूँ मांगे गये तो Rates evalution के तरीके का अनुपालन क्यूँ नही?
ऐसी ही अनेकों भ्रातियाँ और खामिया भरी हुई जिनसे उक्त पूरे टेण्डर प्रक्रिया ही प्रथम दृष्टया दोषी और निरस्त होने योग्य प्रतीत हो रही है।
वैसे भी विगत लगभग एक वर्ष से उत्तराखंड के वेब न्यूज पोर्टलों को सूचना विभाग ने विज्ञापन भी तो नहीं जारी किये और विज्ञापनों के आवंटन प्रक्रिया में “अंधा बाँटे रेबडी, अपने अपने को दे” अधिकांश धनराशि बडे तथा गेटिंग सेटिंग वाले ले जाते हैं और उनके भुगतान भी फटाफट हो जाते हैं क्यूँकि वे ही तो इनके कमाऊ पूत हैं अन्यों के लिए तमाम नियम व बंधिशे और वजट खत्म का नारा ही बुलंद है।
क्या महानिदेशक सूचना इस अव्यवहारिक और नियम विरुद्ध प्रक्रिया को जो प्रक्योरमेंट पालिसी के विरुद्ध है तथा मनमाने ढंग से किये गये टेण्डरों को अपने सुरक्षित अधिकारों का प्रयोग करते हुये निरस्त करेगे या फिर सबका साथ सबका विकास की राह पर चलने वाले वंशी बाबू प्रसाद बांटने में भी भेदभाव की नीति अपनायेंगे और इस द्विभेदी गलाघोंटू विवाद को कोर्ट का रास्ता दिखायेंगे?
देखना यहाँ गौरतलव होगा कि सूचना मंत्री व धाखड एवं धुरंधर मुख्यमंत्री इस प्रकरण की गम्भीरता को देखते हुए संज्ञान लेते हैं या फिर ‘बी और ‘सी’ केटेगरी के न्यूज पोर्टल व वेब स्वामियों को गर्त का रास्ता ही दिखायेंगे?
