देहरादून। वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (वीएमएसबी-यूटीयू) में परिसर संस्थानों के निदेशक पदों के अतिरिक्त प्रभार को लेकर प्रशासनिक विवाद गहरा गया है। आरोप है कि कुलपति की ओर से तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अधिकार क्षेत्र से जुड़े विषयों में आवश्यक अनुमोदन के बिना ही निदेशकों का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा जा रहा है। इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय ने आदेश संख्या 2727/वीएमएसबी-यूटीयू/2026, दिनांक 29 अक्टूबर 2026 के माध्यम से प्रौद्योगिकी संस्थान गोपेश्वर, चमोली के निदेशक का अतिरिक्त कार्यभार पुनः सौंपा है। इस संबंध में 30 अक्टूबर को कार्यभार ग्रहण करने की सूचना भी विश्वविद्यालय के कुलसचिव को भेजी गई है।

मामले में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि गोपेश्वर और टनकपुर जैसे परिसर संस्थानों में निदेशक का अतिरिक्त प्रभार जिन प्राध्यापकों को दिया जा रहा है, वे मूल रूप से पौड़ी और द्वाराहाट के संस्थानों से संबंधित बताए जा रहे हैं। ऐसे में दूसरे संस्थान के प्राध्यापक को अतिरिक्त कार्यभार सौंपने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति ली गई या नहीं, यह स्पष्ट करने की मांग की जा रही है।
मंत्री के अधिकार क्षेत्र को लेकर उठे सवाल
तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत विभागीय मंत्री होने के साथ-साथ संबंधित राजकीय संस्थानों के अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में आरोप लगाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके अधिकार क्षेत्र से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों में आवश्यक अनुमोदन की प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
हालांकि, इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि संबंधित आदेश जारी करने से पहले शासन या सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई थी या नहीं।
तीन साल से अधिक की प्रतिनियुक्ति पर भी सवाल
प्रकरण का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू संबंधित प्राध्यापकों की प्रतिनियुक्ति अवधि है। आरोप है कि निदेशक के रूप में प्रतिनियुक्ति पर तीन वर्ष से अधिक समय पूरा होने के बावजूद उनके कार्यभार को जारी रखा गया है।
इसको लेकर सवाल उठ रहे हैं कि प्रतिनियुक्ति की निर्धारित अवधि क्या थी और क्या कार्यकाल बढ़ाने के लिए सक्षम प्राधिकारी की विधिवत अनुमति प्राप्त की गई थी। वित्त विभाग की स्वीकृति और अन्य आवश्यक अनुमोदनों को लेकर भी पारदर्शिता की मांग की जा रही है।
यदि निर्धारित प्रतिनियुक्ति अवधि पूरी हो चुकी है, तो संबंधित प्राध्यापकों को निदेशक का कार्यभार जारी रखने का आधार क्या है? क्या कार्यकाल का विधिवत विस्तार किया गया है और यदि हां, तो उसका अनुमोदन किस स्तर पर हुआ?
विश्वविद्यालय प्रशासन से स्पष्टीकरण की मांग
इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय और शासन से कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जवाब मांगा जा रहा है। इनमें कुलपति के अधिकार क्षेत्र, मंत्री एवं शासन की पूर्व स्वीकृति, प्रतिनियुक्ति अवधि के विस्तार और निदेशक पदों पर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया जैसे विषय शामिल हैं।
निष्पक्ष जांच और अभिलेख सार्वजनिक करने की मांग
मामले को विश्वविद्यालय की प्रशासनिक पारदर्शिता और शासन के अधिकारों से जोड़कर देखा जा रहा है। मांग की जा रही है कि शासन संबंधित आदेशों, प्रतिनियुक्ति अवधि, कार्यकाल विस्तार और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृतियों की निष्पक्ष जांच कराए।
अब देखना होगा कि तकनीकी शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत और शासन इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर स्पष्टीकरण आने के बाद ही पूरे प्रकरण की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।